Thursday, 28 January 2016

देश के सच्चे लाल थे लाला लाजपतराय


आज भारत की एक स्वतंत्र पहचान विश्व मानचित्र पर है.उभरती हुई शक्ति मे हमारे देश का नाम गिना जा रहा है.दिन रात भारत प्रगति के नए-नए आयाम को गढ़ रहा है.बदलाव और प्रगति की धारा का कोई छोड़ नहीं है.भारत को अभी मिलों चलना है.विकसित देशों की तुलना में भारत अभी बहुत पीछे है.अगर वर्तमान  विकास दर से भारत प्रगति करते रहें,तो हमारे देश को समृद्ध देश की कतार के पास पहुँचने में वर्षों लग जायेंगे.इसमें कोई दो राय नहीं कि विकसित देशों की तुलना में भारत देर से आज़ाद हुआ हैं.स्वाभाविक है,उसके समक्ष पहुँचने में समय लगेगा.
कुछ दिनों पहले ही भारत ने 67वां गणतंत्र दिवस मनाया हैं.गणतंत्र बनने से ठीक तीन साल पहले भारत स्वतंत्र हुआ था.कुल मिलाकर देखें,तो भारत को स्वतंत्र हुए लगभग 69 वर्ष हुए हैं.भारत के स्वतंत्र होने की डगर आसान नहीं थीं.अंग्रेजों ने हमारे ही लोगों को विश्वास में लेकर हम पर शासन किया.कॉंग्रेस की स्थापना 1885 में,ए ओ ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफ्रिन के निर्देश पर किया था.हम में से बहुत से लोग कॉंग्रेस को भारत को आजादी दिलाने के लिये गठित संस्था के रुप में जानते हैं.पर हकीकत यह है कि कॉंग्रेस की स्थापना अंग्रेजों की चापलूसी करने वाले लोगों के लिए की गई थीं.कॉंग्रेस के अधिकतम सदस्य डॉक्टर,वकील व उस जैसे वर्ग के अमीर लोग होते थें.फिरंगी उन्हें सुख सुविधा की कुछ चीजें मुहैय्या करा देते थे और वे लोग हर मुद्दे पर उनका समर्थन करते थें.उन राज़भक्तों का तो यहां तक मानना था कि अंग्रेजों का भारत आना मांगलिक है.वह हम असभ्य को सभ्य बनाने आए हैं.जिस दिन हम शिक्षित,सभ्य व जागरूक बन जायेंगे,वे खुद ही हमें छोड़ कर चले जायेंगे.लेकिन हर चीज़ दो में विभक्त होती है.वाद का प्रतिवाद होना स्वाभाविक है.फलस्वरूप कॉंग्रेस में 1893 के आसपास राष्ट्रवादी नारे लगने लगें.आगे चलकर कॉंग्रेस दो खेमे में बंट गई.जो लोग अंग्रेजों के कद्रदान थे,उन्हें राज़भक्त या नरम दल  और जो लोग राष्ट्रवादी नारे लगाते थें,उन्हें राष्ट्रभक्त अथवा गरम दल कहा गया.गोविंद रानाडे,फिरोजशाह मेहता व गाँधी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले राज़भक्त अथवा नरम दल के प्रमुख नेता थें.नरम दल में बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपतराय व विपिनचंद्र पाल जैसे लोगों की जमात थीं.उस समय अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत का सुर लाल,बाल,पाल की इसी तिकड़ी ने शुरू किया.वक्त के साथ बगावत तेज होता चला गया और एक समय ऐसा आया की कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ बिगुल फूंक दिया.गरम दल के ये नेता कॉंग्रेस में अपनी बातों को मनवाने लगें.अंग्रेजों का कॉंग्रेस की स्थापना का खेल उल्टा पड़ गया.अब कॉंग्रेस के अधिकतर लोग अंग्रेजों की चापलूसी नहीं,भारत की आजादी मांगने वाले हो गए थें.पूर्ण स्वराज की मांगे तेज हो गई.कॉंग्रेस ने 1930 के अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की माँग रख दी.अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया कि अंग्रेज भारत को अब अगर पूर्ण स्वराज नहीं देगा,तो भारत खुद को आपही स्वतंत्र घोषित कर देगा.इसके बाद से ही हर वर्ष 26 जनवरी को देश में तिरंगा लहराया जाने लगा.अंग्रेजों ने भारत की मांग को ठुकरा दिया.मगर भारत का स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच गया था.अंग्रेजों को भी इस बात का भान हो गया की भारत के स्वतंत्रता की आवाज़ को अब और दबाया नहीं जा सकता हैं.परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने भारत को आज़ाद करने की घोषणा कर दी और भारत 15अगस्त,1947 को सदा-सदा के लिये स्वतंत्र हो गया.भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारी सैनानी हुए,जिन्होंने अकेले दम पर अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाया.लाला लाजपतराय राय भी उन्हीं दधीचि में से एक थें.आज उन्हें उनकी जयंती पर सम्पूर्ण कृतज्ञ राष्ट्र याद कर रहा हैं.लाला लाजपतराय उसी लाल,बाल,पाल तिकड़ी के थें,जिन्हें राष्ट्रभक्त अथवा गरम दल का उद्गम कहा जाता है.

Sunday, 24 January 2016

सही मायने में बोस थे नेताजी


"तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" यह वाक्य हमारे जेहन में आते ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस की यादें ताजा हो जाती हैं.स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी के बहुमूल्य योगदान से हम सभी परिचित हैं.नेताजी उन स्वतंत्रता आंदोलनकारियों में एक हैं जिन्होंने हमें अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवाया.आज सम्पूर्ण कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें उनकी 119 वीं जयंती पर याद कर रहा है.
सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही दिव्य प्रतिभा के धनी व्यक्ति थें.खुद के बनाए रास्ते पर चलने वाले सुभाष बोस अडिग विचारधारा के पुरुष थे.अपने दिये वचन को पूरा करने के लिये उन्हें चाहे जो भी परिस्थितियों से गुजरना परे,जो भी कष्ट उठाना परे वो उसके लिये सदेव तैयार रहते थें.वह नेताजी ही थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा को निरूपित करने के लिये पहले भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा 'सिविल सर्विस'को पहले पास किया फ़िर त्याग पत्र दे दिया.उनकी जीवन दृष्टि बिल्कुल साफ थी.वो खुद के लिये नहीं देश के लिये जीना चाहते थे और आजीवन देश के लिये जीते रहें.सुभाष चंद्र बोस अद्वितीय चरित्र के व्यक्ति थें.उनकी सोच,विषम समय में दिये गए विचार आज भी हमारे जीवन की विभिन्न अवस्था में तर्कसंगत हैं.हमारे स्वतंत्रता आंदोलनकारियों में उनकी पहचान गरम दल के नेता के रूप में थी.वह दुश्मनों को हर वक्त पीड़ा देने में विश्वास रखते थे.जब दुनिया द्वितीय विश्वयुध्द के दहलीज पे खड़ी थी तो कॉंग्रेस,तब भारत को आज़ादी दिलाने के लिये गठित संस्था में यह प्रश्न बड़े जोर से उठा कि भारत किसके पक्ष में होगा.तब सुभाष बोस ने कॉंग्रेस अध्यक्ष के नाते कहा था कि"दुश्मन का दुश्मन हमरा दोस्त होगा"नेताजी के इस विचार से कॉंग्रेस के सभी सदस्य असहमत हो गए परिणामस्वरूप नेताजी ने कॉंग्रेस अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया.इस्तीफा देने के बाद भी नेताजी शांत नहीं बैठे उन्होंने अंग्रेजों से दो-दो हाथ करने के लिये अपनी एक अलग रणनीति बनाई.अपनी अलग सेना का गठन किया और उसके सेना नायक बने.भारत को आज़ादी दिलाने के लिये उन्होंने कई राष्ट्रों की सेना को अपने साथ किया.वो जल्द ही विदेशी सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों पर आक्रमण करने वाले थे पर नीयति को कुछ और ही मंजूर था और 18 अगस्त,1945 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई.नेताजी अब हमारे बीच नहीं हैं.लेकिन,उनकी सोच,विचार  और अदम्य साहस ने उनके पीछे क्रान्तिकारियों की एक विशाल फौज छोड़ गई जिन्होंने हमें आज़ादी दिलाई और नेताजी के अधूरे सपने को पूरा किया.सुभाष चंद्र बोस सही मायने में बोस थें.उनको याद करने का,उनके प्रति श्रध्दा सुमन अर्पित करने का सबसे अच्छा तरीका यह है  कि हम उनकी अच्छाइयो को अपने जीवन में उतारें.
जय हिंद !!!