Saturday, 20 August 2016

ये जीत हमारे"द्रोणाचार्यों"के लगन की भी है


देश में चहुंओर ओलम्पिक की गूंज है.मेडल का इंतजार ख़त्म हो चुका है.देश की दो बेटियों ने करोड़ों अरमानों को पूरा कर दिया है.गर्व के इस स्वर्णिम क्षण को सम्पूर्ण राष्ट्र जी रहा है.सिंधु व साक्षी को पूरे देश से बधाई संदेश आ रहे हैं.भारत को अलंकृत करने वाली बेटियों पर इनामों की झड़ी लग गई है.लगनी चाहिये.इन्होंने हमारी पहचान को विश्व फलक पर प्रतिबिम्बित किया है.पर कुछ चेहरे परदे के पीछे हैं.खिलाड़ियों को हम याद करते हैं,पर उन्हें आकार देने वाले को भूल जाते हैं.खेल में प्रशिक्षक का योगदान बहुत अहम होता है.प्रशिक्षक रात में जागकर खिलाड़ियों के खेल का विश्लेषण करते हैं,तो दिन में गलतियों को सुधारने का गुरुमंत्र देते हैं.प्रशिक्षक का काम अहर्निश(दिन-रात)होता है.

"शिष्य चोटी पर चले जाते हैं,गुरु वहीं रह जाते हैं"इसमें कोई दो राय नहीं है.आज पी वी सिंधु,साक्षी मलिक,दीपा करमाकर का सितारा बुलंदियों पर है.ये नाम आज देश में नन्हें सपने को अंकुरित कर रहे हैं.न जाने कितनी आँखों में सिंधु साक्षी बनने की सोच का जागरण हुआ है.पर कहां हैं वो नाम,जिसने इन खिलाड़ियों की प्रतिभा को तराशा है.उसे ओलम्पिक जैसे विश्व मंच पर मेडल जीतने लायक बनाया है.ये कैसी परम्परा है.खेलों से लोगों का ये कैसा विचित्र प्यार है.

हमारे मेडल विजेता प्लेयरों पर पैसे की बारिश हो रही है.कोई ज़मीन दे रहा है,तो कोई नौकरी.बी एम डब्लू जैसी महँगी कारें गिफ्ट की जा रही हैं.अच्छी बात है,इससे खेलों को प्रोत्साहन मिलता है.पनपते मन को प्रेरणा मिलती है.पर खेलों का यह प्रोत्साहन अधूरा है.इस परिपाटी में गुम हैं हमारे'द्रोणाचार्य'.क्या इनामों की हो रही बारिश की एक छटा हमारे दक्ष ट्रेनरों पर नहीं होनी चाहिये?क्या उनका योगदान प्रशंसनीय नहीं है?अगर हां,तो फ़िर ये भेदभाव क्यों?इस बात को हमें समझना होगा की ट्रेनरों की अथक मेहनत का ही दूसरा नाम है"पी वी सिंधु,साक्षी मलिक,दीपा करमाकर".

देश के खेल प्रशिक्षकों के हालात अच्छे नहीं हैं.उन्हें कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है.सरकारी सहायता नगण्य है.खेलों का प्रारूप बदल गया है.कोई भी गेम आज अच्छी पिच पर महंगे साजो-सामान से खेली जाती है.खेलों की इन अत्याधुनिक सामानों को जुटाना मुश्किल होता है.जिसे किसी भी तरह ट्रेनर मुहैया कराते हैं.ट्रेनरों की इस कठिन हालात को बदलना वक्त की ज़रूरत है.चीजें बदलेंगी तो ट्रेनरों का सम्पूर्ण ध्यान प्लेयरों के प्रदर्शन में सुधार पे होगा.प्रशिक्षण अच्छा मिलेगा तो अच्छे खिलाड़ियों की एक फौज खड़ी होगी.ओलम्पिक गेमों में हमें फिर पदकों के लिये टकटकी नहीं लगानी पड़ेगी

Tuesday, 16 August 2016

लापता विमान एएन-32 का अब तक कोई सुराग नहीं


एयरफोर्स का मालवाहक विमान एएन-32 पिछले  27 दिनों से लापता है.विमान में चालक दल के छह सदस्य मिलाकर कुल 35 लोग थे.जहाज चेन्नई से पोर्टब्लेयर जा रही थी.विमान के पहुँचने का इंतज़ार आज भी किया जा रहा है.अभी तक यह गुमशुदा है.

अपनों से एक दिन का विरह चुभाने वाला होता है.जुदाई पे न जाने कितने लेखकों व कवियों ने अपनी भावनाओं को उपस्थित किया है.आज देश के 35 परिवारों व उनके चाहने वालों की मानसिक पीड़ा की हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं.हर रोज उनके अपने ये सोच कर सो जाते होंगे कि कल कुछ पता चल जायेगा.अब तो शायद उम्मीदों पर भी उम्मीद नहीं होता होगा.वक्त जो इतने गुजर गए.

विमान को ढूंढने की पुरजोर कोशिश की जा रही है.जल,थल और वायु तीनों जगह से सर्च अभियान जारी है.मदद सेटेलाइट्स की भी ली गई है.तमाम आधुनिक यंत्रों से पता लगाने की कोशिश जारी है.तलाशी अभियान में दूसरे देशों से भी सहायता की अपील की गई है.अफ़सोस! विमान का पता आज तक नहीं चल पाया.सर्च ऑपरेशन जारी है.उम्मीदों का दीया भी जल रहा है.

कहते हैं विज्ञान ने तरक्की कर ली.जिंदगी आसान हो गई है.हर तरफ़ नवीन तकनीक की बयार है.अब तो मंगल सहित अन्य ग्रहों पर जिंदगी की भी तलाश हो रही है.कितनी रोमांचक बातें हैं.सोच के मन पुलकित हो उठता है.हकीकत देखिये.नवीन तकनीक का खोखला रुप सामने है.पिछले 27 दिनों में एक जहाज़ का पता नहीं लग पाया.किसी को कोस नहीं रहा हूं.कितने बेचारे हैं हम ये महसूस कर रहा हूं.

कुछ सवाल भी हैं.पूछा जाना जायज है.क्या उड़ान भरने से पहले विमान की जांच हुई थी.जहाज कितने वर्ष पुराना था.आखिर एयर ट्रेफिक कंट्रोल से सिग्नल टूटने का कारण क्या था.ये ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब सरकार को देना चाहिये.विमान गुमशुदगी का लम्बा इतिहास है.हमारी बढ़ी हुई तकनीक आज भी इसे रोकने में नाकामयाब है.यह चिंता का सबब है.