राजनीति का खेल भी निराला है,यहां सब जायज है.इसमें न तो दोस्ती पक्की होती है और न ही दुश्मनी स्थायी.भरतीय राजनीति के रंग ही कुछ ऐसे हैं,जिस पार्टी को चुनाव प्रचार में सबसे भ्रष्ट बताया उसी से चुनाव परिणाम बाद सत्ता खातिर गठजोड़ कर ली.सत्ता पाने की भूख हमारे राजनीतिक दलों में इतनी है कि ये लोग किसी भी दस्तरखान पर आसन लगाने में नहीं हिचकते.
लगभग जितने भी राजनीतिक दल हैं,उनका पहला और प्राथमिक उदेश्य होता है किसी भी तरह गद्दी हासिल की जाये.राजनीतिक दलों की सारी आदर्श बातें चुनाव प्रचार तक ही सीमित रहती हैं,इसके बाद ये लोग आम जनों के विश्वास को हलाल करने में भी गुरेज नहीं करते.इन लोगों के लिये मर्यादा व विचारधारा कोई मायने नहीं रखती.इतिहास इन चीजों का कई बार गवाह बना है.फिर बात 2013 के दिल्ली विधान सभा चुनाव की हो या पिछले साल हुये जम्मूकश्मीर विधानसभा के चुनाव का अथवा बिहार की राजनीति का महगठ्बन्धन इसमें राजनीतिक दलों ने जिस तरह से राजनीति की सारी विचारधारा को तार-तार करते हुये एक दूसरे से हाथ मिलाया इसके बाद इस सम्बन्ध में बहुत कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है....और वैसे भी ये उदाहरण तो सिर्फ एक बानगी हैं,ऐसे विश्वास परस्त राजनीति के बहुसंख्य उदाहरण हैं.राजनीतिक दलों की सत्ता पाने हेतु किसी भी हद से गुजरने वाली जज्बा ने जनता के विश्वास,अरमान व सपने की कई बार बलि दी है.
हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने हमें आज़ादी दिलायी राष्ट्र के नवनिर्माण के लिये,जहां प्रत्येक नागरिक का स्वाभिमान हो किसी भी रुप में किसी के अधिकार का अतिक्रमण न हों लेकिन,आज हमें अपनी आजादी पर ही शंका होती है.क्या हम वास्तविक रुप में आजाद हैं?
क्या हम सभी स्वभिमान सहित जिंदगी जीतें हैं?या फिर यह आजादी हमें सिर्फ सत्ता के बदलाव के रूप में मिली है.पहले अंगरेज़ हम पर छलनीति से राज़ करते थे और आज़ वही काम हमारे राजनीतिक दल कर रहें हैं.अगर राजनीतिक दल लोकतंत्र की बुनियाद जनता के प्रति ही उत्तरदायी नहीं होंगे तो इसे क्या कहेंगे?राजनीति!या छलनीति
धन्यवाद!
आपका विचारक:नयन


