Saturday, 22 August 2015

चुनावी जुमला या नयी राजनीति की शुरुवात......


मोदी सरकार ने बिहार को 1.65 लाख करोड़ का विशेष आर्थिक पेकेज देकर राजनीति के बिसात पर बहुत बड़ा दांव खेला है.बिहार विधानसभा का चुनाव आगामी अक्टुबर -नवम्बर महीने में होने वाले हैं,जिसे देखते हुये इस विशेष आर्थिक पेकेज को राजनीतिक महकमे में सियासी चाल की संज्ञा दी जा रही है.तमाम विपक्षी पार्टी इसे बिहार की जनता को लुभाने का हथकण्डा बता रही.विपक्ष का कहना है कि चुनाव आते ही प्रधानमंत्री किसी खास जगह पर केंद्रीत हो जाते हैं जो कि प्रधानमंत्री की पद की गरिमा के खिलाफ है.महगठ्बन्धन के नेताओं का कहना है कि बीते 15 महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की एक भी यात्रा नहीं की लेकिन,चुनाव आते ही मोदी ने बिहार में डेरा डालना शुरू कर दिया.यह तुष्टीकरण की राजनीति को प्रदर्शित करता है.विपक्ष के आरोपों पर गौर करें तो यह एक हद तक जायज भी है.सत्तासीन होने के बाद मोदी ने एक बार भी बिहार का दौरा नहीं किया और न ही उन्होने बिहार की भविष्य योजनाओं के ऊपर कोई उच्च स्तरीय चर्चा की जबकि पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात कह चूके हैं.ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है.हालाँकि.प्रधानमंत्री का हर सभा में हर जगह विकाश योजनाओं पर चर्चा करना निहायत ही सुंदर राजनीति के लिये अच्छा संकेत है.कम से कम बात विकाश की हो तो रही......
चुनाव प्रचार को जाति,धर्म व मज़हब से अलग तो किया जा रहा......यह नयी राजनीति के लिये शुभ है.
लेकिन,अगर मोदी सरकार की यह घोषणा चुनाव परिणाम पर निर्भर करती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा !
अगर प्रधानमंत्री ने सही मायने में विकसित बिहार की कल्पना की है तो चुनाव परिणाम कुछ भी हों,बिहार की गद्दी पर शासन चाहे जिस भी दल का हो,पेकेज की राशि बिहार सरकार को समय दर समय मिलें.यह नयी राजनीति की परिभाषा होगी पर पहले की कुछ घोषणाओं की तरह अगर यह भी महज चुनावी जुमला साबित हुआ तो यह भरतीय जनता पार्टी के पतन के कारणों में से एक हो सकता है.
आपका विचारक:नयन
धन्यवाद !!!   

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