Friday, 2 October 2015

जनता के अरमानों को समझें दल


एक पुरानी कहावत है,लिखित शब्दों की जगह मौखिक शब्दों का महत्व गौण होता है,लेकिन राजनीति में ठीक इसके विपरीत होता है.जिस राजनेता में बड़बोलापन जितनी अधिक होगी वे उतने ही राजनीतिक कुशल हैं.हमारे नेताओं को आंकड़ों की राजनीति अच्छी नहीं लगती,वे इससे कतराते हैं क्योंकि उनके कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है.
बिहार में चुनावी राजनीती का अभिनय शुरू हो गया है.तमाम दल जनता को अपने पाले में करने के लिये बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं.खुद को जनता का सबसे वफादार साबित करने की होड़ लगी है.कोई भी दल इस समर में खुद को पीछे नहीं देखना चाहता।राजनीति के ये शूरमा जनता को अपनी पार्टी के प्रति आसक्त करने के लिये राजनीति के बिसात पर तमाम चाल को आजमा लेना चाहते हैं.बाद में कोई कशक न रह जाये इसके लिये हर तरह के ट्रम्प को आजमा लिया जा रहा है.लेकिन सवाल यह है कि राजनीतिक डालो को जनता की याद चुनाव के दरम्यान ही क्यों अति है!आखिर सरकार बनने के बाद वह 5 साल तक ऐसे कौन से शोध में लगे रहते हैं जिसका सिर्फ शोध पत्र अगले चुनाव प्रचार में सामने आता है,और फिर इसे भविष्य की विकास नीति बता चुनाव लड़ी जाती  है.अगर ऐसा नहीं है तो हर चुनाव केवल बिजली,पानी,गरीबी,बेरोजगारी व अशिक्षा के नारों पर ही क्यों लड़ा जाता है.सरकार समाज के विकास की दूरदर्शी नीति बनाये इससे  किसी को कोई परेसानी नहीं,लेकिन ये नीतियां समाज के कल्याण के लिये होनी चाहिये नाकि फाईलों की सुंदरता के लिये।अगर राजनीतिक दल  सही रूप में कार्य करना चाहते  हैं,तो वह अपनी नीतियों के लिये समय-सीमा तय करें।यदि किसी विशेष कारण के बिना वह तय समयावधि के भीतर  कार्य करने में असफल होते  हैं तो जनता से माफ़ी मांगे।राजनीतिक दलों के सर जनता के कल्याण का शेहरा बंधा है उसे अटल रखना नेताओं की जिम्मेवारी है.जनता पारदर्शी नेतृत्व चाहती है.जनता कांच की तरह बेदाग शासन चाहती है.दलों के पास जनता के अरमानों की बलि देने का कोई अधिकार नहीं है.अगर दल सही मायने में तरक्की पसंद हैं तो उसे उदार बनना होगा,उन्हें सच्चाई स्वीकार करने की आदत डालनी होगी।यदि किसी दूसरे दल की नीतियों में कुछ अच्छा है तो उसे बेझिझक स्वीकार करना होगा।जनता उदार नेतृत्व चाहती है.जनता एक ऐसा नेतृत्व चाहती है जिसमे अच्छी चीज़ो का सब मिलकर सम्मान करें और गलत चीज़ों के खात्मा का संकल्प लें.
समाज को बदलना किसी दूसरे गृह की बात नहीं है.यदि इच्छाशक्ति ढृढ़ तथा विजन स्पष्ट हो तो देखते ही देखते समाज बदल जाएगी।और फिर झूठ,फरेब व दोषारोपण की राजनीति नहीं करनी पड़ेगी
धन्यवाद!आपका विचारक:नयन     

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