Wednesday, 30 November 2016
Tuesday, 22 November 2016
यात्री सुरक्षा पर ध्यान दे रेलवे
दुर्घटना छोटी हो या बड़ी पीड़ा दायक होती है.जान-माल की क्षति होती है तुरत और उसका असर सालों-साल रहता है.जो अपने करीबी को खोते हैं जीवन भर की जुदाई दुर्घटना उन्हें समय के एक झटके में दे देती है.कोई आजीवन बिस्तर का गुलाम बन जाता है.न जाने कितने सपनों को दुर्घटना क्षत-विक्षत कर देती है.एक पल में कोई विधवा,तो ऑफिस से आने में थोड़ी देर लेट होने पर फोन कर डांट लगाने वाली अलविदा कह देती है.जिन बच्चों को माँ बाप ने बड़े होकर इंजिनियर,डॉक्टर,ऑफिसर और न जाने क्या-क्या बनने के सपने देखें थे,वो पल भर में चूर हो जाते हैं.यह दुर्घटना बहुत निर्मम होती है.ये दर्द बहुत कड़वी देती है.
कानपुर के नज़दीक हुई रेल दुर्घटना हालिया वर्षों में सबसे वीभत्स है.अभी तक 146 लोगों की जाने जा चुकी हैं,200 से अधिक लोग गंभीर रूप से जख्मी हैं.ट्रेन इंदोर से पटना जा रही थी.घटना उस वक्त हुई जब कुछ ही समय बाद एक नयी सुबह दस्तक देने वाली थी.रात के करीब तीन बज रहे थे.एक जोरदार आवाज़ आती है और उसके बाद हर तरफ़ चीख-पुकारें.ट्रेन का 14 डिब्बा पटरी से उतर जाता है.एक तरफ़ मौत की खामोशी रहती है दूसरी तरफ़ घायलों की चीत्कार.रात के घने अंधेरे में हर तरफ़ दर्द व मातम पसरा था.यात्रियों के बदन से निकलते रक्त धरती को लाल किये जा रही थीं.सब तहस नहस हो गया था.
लोग घरों में अपनों के पहुंचने का इंतज़ार कर रहे थे.पर सुबह की पहली किरण के साथ आयी ख़बर ने उन्हें मर्माहत कर दिया.फोन घनघनाने लगीं.अपनों के बारे में जानने को लोग छटपटाने लगे.न्यूज़ चैनलों पर खबरें चलने लगी.हर मिनट मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी,जो परिवार वालों की बेचैनी को बढ़ा रही थी.दुर्घटना को रोका नहीं जा सकता है इससे इंकार नहीं है,पर वैज्ञानिक प्रगति के साथ इसे कम ज़रूर किया जा सकता है.भारतीय रेल देश की लाइफ लाइन है.यह पुरे देश की दूरी को पाटती है.दिलों को दिलों से जोड़ती है.पर दिलों को दिल से मिलाने वाली भारतीय रेल जब लोगों को काल के गाल में झोंक दे,तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?
हर साल रेलबजट में बड़ी-बड़ी बातें होती हैं.यात्रियों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता बताया जाता है.लोगों की मंगल यात्रा के लिये घोषणाओं के पूल बांध दिये जाते हैं.यकीन न हो तो रिकॉर्ड कहता है कि पुरानी घोषित योजनाओं को पुरा करने के लिये रेलवे को लाखों करोड़ रुपये की जरूरत है.पर नई घोषणायें पुरानी हो जाती हैं और जनता को लुभाने के लिये फिर नये सपने दिखाये जाते हैं.हाई स्पीड ट्रेन व वाईफाई की बातें ठीक है.यात्रियों को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचना पहली जरूरत है.रेल दुर्घटना का एक लम्बा इतिहास रहा है,जिसमें न जाने कितने लोगों ने अपनी जिंदगी खोई हैं.अब जब हम बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं,तो यात्रा के दौरान लोग महफूज़ रहें इसपे भी काम होनी चाहिये.
मंगलयान की सफलता लोगों के जेहन में अमर हो जाये इसके लिये सरकार ने मंगलयान की तस्वीर को नोटों पे उतरवा दिया.फक्र का विषय है.किसी को कोई शिकायत नहीं है.समय की दरकार है रेलवे में भी नयी टेक्नॉलॉजी पिरोयी जाये.इसे आधुनिक बनाया क
जाये.तकनीक के सहारे रेलवे सुरक्षा को पुख्ता किया जा सकता है.सरकार लोगों के जान की कीमत को समझें और रेलवे में तकनीक का इस्तेमाल कर इसे उच्च सुरक्षा मानकों पर खड़ा करें.फिर घरों में अपनों का इंतजार करने वाले परिजनों को आशंकाओं के बादल नहीं डराएंगे.रात में यात्रा करने वाले यात्रियों को अनहोनी का डर नहीं रहेगा और वो पुरे सफर चैन की नींद ले सकेंगे.
Wednesday, 16 November 2016
बेबस आंखों को अरबसागर बनने से तत्काल रोके सरकार
आपने इंसानों की कतारें देखी हैं.देखे होंगे.सरकारी राशन की दुकनों के पास.त्योहारों के समय रेलवे टिकट काउंटर के नजदीक.मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारों आदि में आस्था के लिये.और हां,कहीं कुछ अगर मुफ्त में मिल रहा हो तो उसके लिये.आपने भी लोगों के हुजूम को देखा होगा.पर ये वाली कतारें कुछ अलग प्रकृति की हैं.यहां न किसी को राशन मिल रहा है,न किसी को ईद पे घर जाने का टिकट.एग्ज़ेम में पास करवाने की दुआ मांगने वाले ये छात्रों की भी लाइनें नहीं हैं.किसी को कुछ मुफ्त भी नहीं मिल रहा है.फिर भी लोगों का ये काफिला बढ़ता ही जा रहा है.
दरअसल,देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहितकारी एक घोषणा की है.500,1000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिया गया है.बहुत सारे तर्क दिये गए हैं.इस ऐतिहासिक निर्णय को लेते वक्त.कालाधन सामने आएगा,रखने वाले 125 करोड़ लोगों के सामने बेनकाब होंगे.आतंकवाद को पैसे से सींचने का काम बंद होगा.अर्थव्यवस्था में मनी फ्लो बढ़ने से,इसे रफ्तार मिलेगा.इतने सारे राष्ट्रोंमुखी कारण पाकर लोगों ने इस फैसले को हृदय से अंगीकार किया.पर एक दिक्कत रह गई.
लोगों को पुराने नोट बदलवाने थें.फैसला बिना पूर्व सूचना के ली गई थीं.अफरातफरी का महौल शुरू हुआ.सरकार ने 30 दिसम्बर तक 50 दिनों का वक्त मुकर्रर किया है,पर लोग 30 दिसम्बर तक का इंतजार करना नहीं चहते हैं.एटीएम व बेंकों में बढ़ती भीड़ यही कह रही हैं.लोग अपने दैनिक कामों को छोड़ पैसे बदलवाने या निकालने लाइनों में खड़े हैं.पुरे दिन लगातर लम्बी होती ये पंक्ति किसी की मज़दूरी खा रहा है.वृद्धों को बेवजह विटामिन-डी की घुटी पिला रहा है.महिलायें परेशान हैं.किचन खाली है,बेंकों में लाइन लम्बी है.
कुछ जगह से लोगों के हताहत होने की भी खबरें आ रही हैं.यह दुखद है.किसी भी व्यक्ति का जीवन कीमती है.लोगों को संयम के साथ काम लेना चाहिये.कतारों में जरुरतमंदों की मदद को हाथ आगे करना चाहिये.पर इस राष्ट्रीय महायज्ञ,जो राष्ट्र की प्रगति में कई प्रकार से मदद करेगा,उसमें अगर किसी ने अपनों को खोया है,तो उनके लिये किया.न सरकार ने अभीतक परिजनों को किसी मदद का आश्वासन दिया है,न ही कोई कथित राष्ट्रीय संस्था मदद को आगे आयी है.देशहितकारी इस काम में अपने प्राणों को भारत माता के शुभ्र आंचल में न्योछावर करने वाले उन आत्माओं के लिये अभी तक "शहीद" अलंकरण से अलंकृत करने की भी आवाजें नहीं आ रही हैं.अपने मेहनत की गाढी कमाई को पाने में,जिसे मौत को पाना पड़ा उनके लिये हम सिर्फ चुप क्यों हैं.
राष्ट्र को प्रगति के पथ पर गतिमान करने वाली किसी भी निर्णय का हम सम्मान करते हैं.हमारी आँखें भी अपने मादरे वतन को दुनिया के विकसित देशों के साथ कदमताल करते देखना चाहती हैं.हर काम को करने का एक रास्ता होता है.काम जब सवा सौ करोड़ लोगों के परिधि का हो,तो तैयारी भी भारत के क्षेत्रफल के बराबर होनी चाहिये.एक बार बेंक या एटीएम के सामने जाइये.लोगों की भीड़ को देखिये.उनकी बेबसी को महसूस कीजिये,जब पैसे हाथ में रहते हुए भी कुछ अस्पताल वाले उनके परिजनों को डिसचार्ज नहीं कर रहे हैं.लाश तक को हॉस्पिटल वाले बंधक बना लेते हैं.ये गलत हैं न ! आप ही बोलिये.इस बेबसी को ख़त्म करना होगा.लाचारों के लिये कुछ और कदम उठाने की जरूरत है,जो लोगों की आँखों को अरबसागर बनने से रोक सके
नोट-सरकार के इस निर्णय का मैं पुरे अंतर्मन से स्वागत करता हूं.
दरअसल,देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहितकारी एक घोषणा की है.500,1000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिया गया है.बहुत सारे तर्क दिये गए हैं.इस ऐतिहासिक निर्णय को लेते वक्त.कालाधन सामने आएगा,रखने वाले 125 करोड़ लोगों के सामने बेनकाब होंगे.आतंकवाद को पैसे से सींचने का काम बंद होगा.अर्थव्यवस्था में मनी फ्लो बढ़ने से,इसे रफ्तार मिलेगा.इतने सारे राष्ट्रोंमुखी कारण पाकर लोगों ने इस फैसले को हृदय से अंगीकार किया.पर एक दिक्कत रह गई.
लोगों को पुराने नोट बदलवाने थें.फैसला बिना पूर्व सूचना के ली गई थीं.अफरातफरी का महौल शुरू हुआ.सरकार ने 30 दिसम्बर तक 50 दिनों का वक्त मुकर्रर किया है,पर लोग 30 दिसम्बर तक का इंतजार करना नहीं चहते हैं.एटीएम व बेंकों में बढ़ती भीड़ यही कह रही हैं.लोग अपने दैनिक कामों को छोड़ पैसे बदलवाने या निकालने लाइनों में खड़े हैं.पुरे दिन लगातर लम्बी होती ये पंक्ति किसी की मज़दूरी खा रहा है.वृद्धों को बेवजह विटामिन-डी की घुटी पिला रहा है.महिलायें परेशान हैं.किचन खाली है,बेंकों में लाइन लम्बी है.
कुछ जगह से लोगों के हताहत होने की भी खबरें आ रही हैं.यह दुखद है.किसी भी व्यक्ति का जीवन कीमती है.लोगों को संयम के साथ काम लेना चाहिये.कतारों में जरुरतमंदों की मदद को हाथ आगे करना चाहिये.पर इस राष्ट्रीय महायज्ञ,जो राष्ट्र की प्रगति में कई प्रकार से मदद करेगा,उसमें अगर किसी ने अपनों को खोया है,तो उनके लिये किया.न सरकार ने अभीतक परिजनों को किसी मदद का आश्वासन दिया है,न ही कोई कथित राष्ट्रीय संस्था मदद को आगे आयी है.देशहितकारी इस काम में अपने प्राणों को भारत माता के शुभ्र आंचल में न्योछावर करने वाले उन आत्माओं के लिये अभी तक "शहीद" अलंकरण से अलंकृत करने की भी आवाजें नहीं आ रही हैं.अपने मेहनत की गाढी कमाई को पाने में,जिसे मौत को पाना पड़ा उनके लिये हम सिर्फ चुप क्यों हैं.
राष्ट्र को प्रगति के पथ पर गतिमान करने वाली किसी भी निर्णय का हम सम्मान करते हैं.हमारी आँखें भी अपने मादरे वतन को दुनिया के विकसित देशों के साथ कदमताल करते देखना चाहती हैं.हर काम को करने का एक रास्ता होता है.काम जब सवा सौ करोड़ लोगों के परिधि का हो,तो तैयारी भी भारत के क्षेत्रफल के बराबर होनी चाहिये.एक बार बेंक या एटीएम के सामने जाइये.लोगों की भीड़ को देखिये.उनकी बेबसी को महसूस कीजिये,जब पैसे हाथ में रहते हुए भी कुछ अस्पताल वाले उनके परिजनों को डिसचार्ज नहीं कर रहे हैं.लाश तक को हॉस्पिटल वाले बंधक बना लेते हैं.ये गलत हैं न ! आप ही बोलिये.इस बेबसी को ख़त्म करना होगा.लाचारों के लिये कुछ और कदम उठाने की जरूरत है,जो लोगों की आँखों को अरबसागर बनने से रोक सके
नोट-सरकार के इस निर्णय का मैं पुरे अंतर्मन से स्वागत करता हूं.
Thursday, 10 November 2016
We still very far to be in a queue of developed nation.
'mera desh badal rha hai,aage badh rha hai' this has been a slogan of our progressive economy given by PM Narendra Modi. Whenever ordinary people of our nation hear it out from the PM himself they felt,there is something taking place that has propensity to boost the economy itself.But it has been also saying in our surrounding that 'speaking is not credible than writing' and yes,it felt viable in terms of economic growth. India's rank in Ease of doing business reveals that how unfair environment is here for setting up businesses. We have been able to got 130 rank. Out neighbors Srilanka,Nepal etc did far better than us in it so far.
When business tycoons had established their plant across the world then they would come to us,because we are on 130th position for doing easy business.
Our policy makers should understand slogans are doing work in elections not in economy. nation's economy would be boosted when government will be going to make business friendly environment and it could be done when law&policy will be friendly,took less time to set up business and importantly it should be easy to acquire lands.
All these things have impact on ranking of Ease of doing business. government should centralize over these to jumped India's rank in it.when Modi administration did all this,automatically we would have been able to sought "Mera desh badal rha hai,aage badh rha hai"
Subscribe to:
Comments (Atom)

