आपने इंसानों की कतारें देखी हैं.देखे होंगे.सरकारी राशन की दुकनों के पास.त्योहारों के समय रेलवे टिकट काउंटर के नजदीक.मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारों आदि में आस्था के लिये.और हां,कहीं कुछ अगर मुफ्त में मिल रहा हो तो उसके लिये.आपने भी लोगों के हुजूम को देखा होगा.पर ये वाली कतारें कुछ अलग प्रकृति की हैं.यहां न किसी को राशन मिल रहा है,न किसी को ईद पे घर जाने का टिकट.एग्ज़ेम में पास करवाने की दुआ मांगने वाले ये छात्रों की भी लाइनें नहीं हैं.किसी को कुछ मुफ्त भी नहीं मिल रहा है.फिर भी लोगों का ये काफिला बढ़ता ही जा रहा है.
दरअसल,देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहितकारी एक घोषणा की है.500,1000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिया गया है.बहुत सारे तर्क दिये गए हैं.इस ऐतिहासिक निर्णय को लेते वक्त.कालाधन सामने आएगा,रखने वाले 125 करोड़ लोगों के सामने बेनकाब होंगे.आतंकवाद को पैसे से सींचने का काम बंद होगा.अर्थव्यवस्था में मनी फ्लो बढ़ने से,इसे रफ्तार मिलेगा.इतने सारे राष्ट्रोंमुखी कारण पाकर लोगों ने इस फैसले को हृदय से अंगीकार किया.पर एक दिक्कत रह गई.
लोगों को पुराने नोट बदलवाने थें.फैसला बिना पूर्व सूचना के ली गई थीं.अफरातफरी का महौल शुरू हुआ.सरकार ने 30 दिसम्बर तक 50 दिनों का वक्त मुकर्रर किया है,पर लोग 30 दिसम्बर तक का इंतजार करना नहीं चहते हैं.एटीएम व बेंकों में बढ़ती भीड़ यही कह रही हैं.लोग अपने दैनिक कामों को छोड़ पैसे बदलवाने या निकालने लाइनों में खड़े हैं.पुरे दिन लगातर लम्बी होती ये पंक्ति किसी की मज़दूरी खा रहा है.वृद्धों को बेवजह विटामिन-डी की घुटी पिला रहा है.महिलायें परेशान हैं.किचन खाली है,बेंकों में लाइन लम्बी है.
कुछ जगह से लोगों के हताहत होने की भी खबरें आ रही हैं.यह दुखद है.किसी भी व्यक्ति का जीवन कीमती है.लोगों को संयम के साथ काम लेना चाहिये.कतारों में जरुरतमंदों की मदद को हाथ आगे करना चाहिये.पर इस राष्ट्रीय महायज्ञ,जो राष्ट्र की प्रगति में कई प्रकार से मदद करेगा,उसमें अगर किसी ने अपनों को खोया है,तो उनके लिये किया.न सरकार ने अभीतक परिजनों को किसी मदद का आश्वासन दिया है,न ही कोई कथित राष्ट्रीय संस्था मदद को आगे आयी है.देशहितकारी इस काम में अपने प्राणों को भारत माता के शुभ्र आंचल में न्योछावर करने वाले उन आत्माओं के लिये अभी तक "शहीद" अलंकरण से अलंकृत करने की भी आवाजें नहीं आ रही हैं.अपने मेहनत की गाढी कमाई को पाने में,जिसे मौत को पाना पड़ा उनके लिये हम सिर्फ चुप क्यों हैं.
राष्ट्र को प्रगति के पथ पर गतिमान करने वाली किसी भी निर्णय का हम सम्मान करते हैं.हमारी आँखें भी अपने मादरे वतन को दुनिया के विकसित देशों के साथ कदमताल करते देखना चाहती हैं.हर काम को करने का एक रास्ता होता है.काम जब सवा सौ करोड़ लोगों के परिधि का हो,तो तैयारी भी भारत के क्षेत्रफल के बराबर होनी चाहिये.एक बार बेंक या एटीएम के सामने जाइये.लोगों की भीड़ को देखिये.उनकी बेबसी को महसूस कीजिये,जब पैसे हाथ में रहते हुए भी कुछ अस्पताल वाले उनके परिजनों को डिसचार्ज नहीं कर रहे हैं.लाश तक को हॉस्पिटल वाले बंधक बना लेते हैं.ये गलत हैं न ! आप ही बोलिये.इस बेबसी को ख़त्म करना होगा.लाचारों के लिये कुछ और कदम उठाने की जरूरत है,जो लोगों की आँखों को अरबसागर बनने से रोक सके
नोट-सरकार के इस निर्णय का मैं पुरे अंतर्मन से स्वागत करता हूं.
दरअसल,देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहितकारी एक घोषणा की है.500,1000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिया गया है.बहुत सारे तर्क दिये गए हैं.इस ऐतिहासिक निर्णय को लेते वक्त.कालाधन सामने आएगा,रखने वाले 125 करोड़ लोगों के सामने बेनकाब होंगे.आतंकवाद को पैसे से सींचने का काम बंद होगा.अर्थव्यवस्था में मनी फ्लो बढ़ने से,इसे रफ्तार मिलेगा.इतने सारे राष्ट्रोंमुखी कारण पाकर लोगों ने इस फैसले को हृदय से अंगीकार किया.पर एक दिक्कत रह गई.
लोगों को पुराने नोट बदलवाने थें.फैसला बिना पूर्व सूचना के ली गई थीं.अफरातफरी का महौल शुरू हुआ.सरकार ने 30 दिसम्बर तक 50 दिनों का वक्त मुकर्रर किया है,पर लोग 30 दिसम्बर तक का इंतजार करना नहीं चहते हैं.एटीएम व बेंकों में बढ़ती भीड़ यही कह रही हैं.लोग अपने दैनिक कामों को छोड़ पैसे बदलवाने या निकालने लाइनों में खड़े हैं.पुरे दिन लगातर लम्बी होती ये पंक्ति किसी की मज़दूरी खा रहा है.वृद्धों को बेवजह विटामिन-डी की घुटी पिला रहा है.महिलायें परेशान हैं.किचन खाली है,बेंकों में लाइन लम्बी है.
कुछ जगह से लोगों के हताहत होने की भी खबरें आ रही हैं.यह दुखद है.किसी भी व्यक्ति का जीवन कीमती है.लोगों को संयम के साथ काम लेना चाहिये.कतारों में जरुरतमंदों की मदद को हाथ आगे करना चाहिये.पर इस राष्ट्रीय महायज्ञ,जो राष्ट्र की प्रगति में कई प्रकार से मदद करेगा,उसमें अगर किसी ने अपनों को खोया है,तो उनके लिये किया.न सरकार ने अभीतक परिजनों को किसी मदद का आश्वासन दिया है,न ही कोई कथित राष्ट्रीय संस्था मदद को आगे आयी है.देशहितकारी इस काम में अपने प्राणों को भारत माता के शुभ्र आंचल में न्योछावर करने वाले उन आत्माओं के लिये अभी तक "शहीद" अलंकरण से अलंकृत करने की भी आवाजें नहीं आ रही हैं.अपने मेहनत की गाढी कमाई को पाने में,जिसे मौत को पाना पड़ा उनके लिये हम सिर्फ चुप क्यों हैं.
राष्ट्र को प्रगति के पथ पर गतिमान करने वाली किसी भी निर्णय का हम सम्मान करते हैं.हमारी आँखें भी अपने मादरे वतन को दुनिया के विकसित देशों के साथ कदमताल करते देखना चाहती हैं.हर काम को करने का एक रास्ता होता है.काम जब सवा सौ करोड़ लोगों के परिधि का हो,तो तैयारी भी भारत के क्षेत्रफल के बराबर होनी चाहिये.एक बार बेंक या एटीएम के सामने जाइये.लोगों की भीड़ को देखिये.उनकी बेबसी को महसूस कीजिये,जब पैसे हाथ में रहते हुए भी कुछ अस्पताल वाले उनके परिजनों को डिसचार्ज नहीं कर रहे हैं.लाश तक को हॉस्पिटल वाले बंधक बना लेते हैं.ये गलत हैं न ! आप ही बोलिये.इस बेबसी को ख़त्म करना होगा.लाचारों के लिये कुछ और कदम उठाने की जरूरत है,जो लोगों की आँखों को अरबसागर बनने से रोक सके
नोट-सरकार के इस निर्णय का मैं पुरे अंतर्मन से स्वागत करता हूं.
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