जुकरबर्ग को खुश करने के लिए नहीं लिख रहा हूं। उन्हें खुश रखने वालों की कमी नहीं होगी। छुटभैये नेताओं को खुश रखने के लिए जब सैकड़ों लोग पीछे से जय हो- जय हो करते रहते हैं, तो जुकरबर्ग साहब के क्या कहने। अब मुद्दे पर आता हूं। जुकरबर्ग को खुश करने वाली बात इसलिए लिखा क्योंकि ऐसे समय में जब लोग फेसबुक को बीमारी और इसकी आदत से बचने के लिए साइकेट्रिस्ट से सलाह तक ले रहे हैं, मैं फेसबुक से उठा सकने वाले कुछ आम फायदों के बारे में लिख रहा हूं।
फेसबुक पर इमेज, लाइव वीडियो और फीलिंग एक्साइटेड विद 24 अदर्स के अलावा टेक्स्ट भी होता है, जो कुछ नया सीखने, जानने और विचारों के उत्सर्जन में बहुत सहायक है। हममें से अधिकतम लोगों ने फेसबुक को बस 50, 100, 200 लाइक्स पाने का अड्डा मान लिया है। लाइक्स की संख्या किसी की 500, 1000 और उससे भी अधिक हो सकती है, मैं उनकी लोकप्रियता को सराहता हूं और बिल्कुल भी किसी प्रकार का द्वेष उनके लिए अपने मन में नहीं रखता हूं।
फेसबुक बीमारी कैसे बनती है अब इस बात को समझिये। इस बीमारी के वायरस हैं- लाइक, कमेंट और नए में आपके वीडियो के व्यूज। फेसबुक यूजर्स ने लाइक, कमेंट्स को बड़े पापा का आशीर्वाद मान लिया और यहीं से शुरू हो जाता है इस मायावी आशीर्वाद का वायरस में तब्दील होना। फोटो अपलोड किया नहीं कि नोटिफिकेशन्स देखना शुरू। समय इतना कि साफ अक्षरों में 97 लाइक्स लिखे रहने के बावजूद कई लोग खुद से लाइक्स गिन लेते हैं, इस आशा में कि कहीं एक-आध लाइक्स जुकरबर्ग गिनना भूल न गया हो। तस्वीर पर कमेंट्स का आना इन्हें इतनी खुशी देता है, जैसे खाने के बाद मीठे का मिलना तय नहीं था, पर इन्हें मिल गया। कमेंट्स के कुछ "कालजयी" शब्द हैं। भले ये एक वर्ड के क्यों न हों, पर 'नाइस पिक' का जवाब 'थैंक यू सो मच' जैसे सर्व गुण सम्पन्न और सम्पूर्ण वाक्य से कम में नहीं दिया जाता है।
अब ऊपर जो लिखा था कि लाइक, कमेंट के अलावा इस डिजिटल मंच पर टेक्स्ट भी होता है उसकी बात करते हैं। ऊपर जो फेसबुक से उठा सकने वाले फायदे के बारे में लिखा था, उस पर आते हैं। फेसबुक जैसे ग्लोबल प्लेटफार्म पर बौद्धिक योद्धाओं की कमी नहीं है। जिस विधा में आपकी रुचि है, उसी पर लिखने वाले बहुत से लोग आपको मिल जाएंगे। शर्त है कि लाइक्स के कॉउंटेड नंबर्स पर शक कर उसे गिनने के बदले ऐसे लिखने वालों को ढूंढ कर आपको उन्हें फॉलो करना होगा। फॉलो इसलिए लिखा हूं क्योंकि ऐसे लोग आपके "फ्रेंड रिक्वेस्ट" के इंतज़ार में घर में नहीं बैठे हैं। सो फ्रेंड बनाने की ज़िद छोड़िये और फॉलो कर उनसे कुछ सीखिए। जिन हिंदी भाषी लोगों की रुचि व्यापक है उनके लिये यहां और भी संभावनाएं हैं। यहां कुछ ऐसे कलमकार हैं, जो अंग्रेजी के विविध माध्यमों से गहरी और रोचक जानकारी लाकर आपके लिए यहां लिखते हैं। सिर्फ अंग्रेजी भाषा का जिक्र इसलिए किया हूं, क्योंकि हमारे देश में एक खास रुतबा हासिल करने के बाद लोग अंग्रेजी में बोलना और लिखना अधिक पसंद करते हैं। जुकरबर्ग की ये डिजिटल सोसाइटी आपको आपकी पसंद के अनुरूप मुफ्त में मन की बात भी सुना सकती है और आप चाहें तो आपको भारत-अमेरिका के बीच बढ़ते मित्रता का कारण भी बता सकती है। फैसला आपका है। एक व्यक्ति के पास इतने संसाधन नहीं होते हैं कि वो लगभग सभी चीज़ों को खुद से पढ़ सके, जान सकें। इस अर्थ में फेसबुक आपकी बहुत मदद कर सकता है। जैसे कि यहां लाखों लोग हैं, वो अपने स्तर से चीज़ों को पढ़ते हैं, सब लोगों के स्रोत अलग हैं, पर इस एक मंच पर सारे लोगों की जानकारी आपको मिल जाती है। बाकी और भी बहुत सारे उदाहरण हैं, जिसकी मदद से इन चीज़ों के प्रति आपकी तंद्रा को तोड़कर आपको जागरूक किया जा सकता है।
फेसबुक का इस्तेमाल कैसे कम करें यह किसी साइकेट्रिस्ट और विशेषज्ञ से पूछने की जरूरत नहीं है। आप बिना परिणाम और लाभदायीे काम में जरूरत से ज्यादा लगे रहेंगे, तो उससे एक नियत समय के बाद ऊबना तय है। फेसबुक के केस में भी आपके साथ यही हो रहा है। फेसबुक पर समय का सदुपयोग करें। अच्छे लिखने वाले, अच्छे मार्गदर्शन करने वाले लोगों के पोस्टों को पढ़ने में अपना समय खर्च करें।लाइक, कमेंट्स जैसे श्रापित भटकाव से 36 का आंकड़ा रखें। इसे गैरजरूरी और महत्वहीन समझने का विवेक आपके अंदर जल्द से जल्द पैदा हो इसके लिए मंगलवार का व्रत शुरू कर सकते हैं। बजरंगवली खुश होंगे तो विवेक जल्दी जन्म लेगा।
नोट- इस विवेक और विकास बबुआ का आपस में कोई संबंध नहीं है। सौतेले भाई भी ये दोनों नहीं हैं।
नयन 😃

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