बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में पूर्ण शराब बंदी की घोषणा की है.सरकार का ये फैसला 1 अप्रेल 2016 से लागू होगा.नीतीश सरकार के इस फैसले से राज्य को 4 हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान होगा.लेकिन नीतीश कुमार ने शराब से अर्जित राजस्व के ऊपर लोगों की खुशहाली को प्रथमिकता दिया है जो कि स्वागत योग्य है.इस नियम के लागू होते ही बिहार उन राज्यों की कतार में आ जयेगा जहां शराब प्रतिबंधित है.देश के तीन राज्यों-गुजरात,नागालेंड व मणिपुर में पहले से ही शराब पूर्ण प्रतिबंधित है.अब इस सूची में अगला नाम बिहार का है.सरकार का यह निर्णय सुशांत समाज निर्माण की दिशा में निहायत ही बहुत बड़ा क़दम है.लेकिन इस क़दम की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जबकि इसे सख्ती से पूरे राज्य में लागू किया जायेगा.आज राज्य या राष्ट्र में प्रतिबंधित चीजों की एक लम्बी फेहरिस्त है,लेकिन ये सारी चीजें बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं.तम्बाकू पे प्रतिबंध हो या पब्लिक प्लेस पे स्मोकिंग की मनाही कागज पे तो ये सारी चीजें प्रतिबंधित हैं लेकिन वास्तविकता हर छोटे पान की दुकान पर दिखते तम्बाकू उत्पाद के गुच्छे और सार्वजनिक जगहों पर स्मोकिंग करते लोगों को देखकर बखूबी लगाया जा सकता है.शराब को राज्य में पूर्ण प्रतिबंधित करना सरकार के लिये आसान नहीं होगा.गुजरात,नागालैंड और मणिपुर जहां शराब पहले से प्रतिबंधित है रिपोर्ट कहते हैं कि इन राज्यों में भी लिकर अन्य राज्यों की तरह आसानी से उपलब्ध हैं.गुजरात की सच्चाई तो यहां तक है कि वहां लिकर की होम डिलेवरी भी होती है.प्रत्येक साल गुजरात में 100 करोड़ का अवैध शराब जब्त किया जाता है.इन सारी चीजों की उपस्थिति के बाद राज्य में पूर्ण शराब बंदी लागू करना नीतीश कुमार के लिये एक चुनौती होगा.सरकार अगर समाज कल्याण के लिये शराब बंदी को लागू करना चाहती है तो इसमें प्रशासन व आम लोगों की भूमिका अहम है.जब तक समाज के इन दो लोगों का साथ नहीं होगा कोई भी नियम या कानून ग्राउंड जीरो पर अमल में आ नहीं सकती.कई बार इस तरह की कानून के नतीजे उलट होते हैं और ये पुलिस-प्रशासन की भ्रष्टचार का नया जरिया बन जाता है.सरकार के लिये ये एक बड़ा चैलेंज होगा और अगर सरकार इसे रोकने में कामयाब होती है तो इस निर्णय की अप्रत्याशित सफलता मिल सकती हैं.

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