भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य नहीं बन पाया है.दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में हुई बैठक भारत के लिए बेनतिजा रही.भारत अपनी मांग पर एकराय बनाने में नाकामयाब रहा.हालांकि अधिकतर देश भारत के पक्ष में थे.चीन के अंततः ना ने हिन्दुस्तान के मंसूबे पर पानी फेर दिया.
एनएसजी परमाणु आपर्तिकर्ता देशों का एक समूह है.इसके सदस्य देश आपस में व्यापार साझा करते हैं.टेक्नोलॉजी सहित यूरेनियम मिलने में सदस्य देशों को आसानी होती है.इन्हीं चीजों के मद्देनजर भारत ने सदस्यता की मांग की थी.लेकिन भारत कामयाब नहीं रहा.
चीन ने भारत का विरोध किया.दलील दी,भारत ने एनपीए यानी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है.बिना इसके परमाणु संसाधन का दुरूपयोग हो सकता है.चीन की ये शर्त बेबुनियाद मालूम पड़ती है.एनएसजी ग्रुप के कई देशों ने एनपीए साइन नहीं किया है.फिर भारत के मामले में ये नया पेंतरा क्यों?
बड़ा दिलचस्प है.चीन ने पाकिस्तान को एनएसजी सदस्य बनाये जाने की मांग की है.चीन ने कहा कि अगर भारत सदस्य बनता है,तो फिर पाकिस्तान भी बनना चाहिये.इसे चीन की मूर्खता कहें या पाक के प्रति दीवानापन.पाकिस्तान कागज पर लोकतांत्रिक देश है.हर दिन,हर क्षण वहां लोकतंत्र की हत्या होती है.यह सिर्फ हम नहीं सारा संसार कहता है.हां.चीन इससे असहमत हो सकता है.
विरोध एक नैसर्गिक प्रक्रिया है,होनी चाहिये.पर उसका एक मजबूत आघार होना जरूरी है.बिना तर्क का विरोध ईर्ष्या या द्वेष ही मालूम पड़ता है.चीन का विरोध कुछ ऐसा ही लगता है.भारत एक जिम्मेदार राष्ट्र है.विश्व में भारत की छवि एक शांतिप्रिय देश की है.चीन ने न सिर्फ इसे नजरदांज किया है,बल्कि अन्य देशों के भारत पर विश्वास को झूठलाया है.
भारत एनएसजी देशों को मिलने वाली सुविधायें नो साल पहले से उठा रहा है.2008 में अमेरिका के साथ हुए संधि के साथ ही भारत को परमाणु सुविधायें मिलने लगी थी..चीन ने इसे भी नहीं देखा.भारत की ये मांग विश्व मंच पर सिर्फ अपनी उपस्थिति से थी.
एनएसजी पर कूटनीतिक असफलता ने देश में विपक्ष को एक मुद्दा दे दिया है.विपक्ष ने इसे विश्व मंच पर भारत की पराजय बताया है.कुछ नेताओं का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन किया है.हालांकि वाद-विवाद लोकतंत्र की खूबसूरति है.कूटनीति कि सफलता-असफलता कभी हार-जीत का विषय नहीं होता.ये आमजन को ध्यान रखना होगा.
भारतीयों के लिए एक खुशी का कारण है.भारत एमटीसीआर यानी मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का का सदस्य बन गया है.भारत अब छोटे मिसाइल व टेक्नोल़ॉजी सदस्य देश को बेच सकेगा.भारतीय रक्षा क्षेत्र के व्यापार में यह बड़ी भूमिका अदा करेगा.बड़ी बात ये है कि भारत को ये कामयाबी पहली बार में ही मिली है.
एमटीसीआर में भारत की सदस्यता ने एक रोचकता को जन्म दिया है.चीन ने एनएसजी पर भारत का विरोध किया है.भारत को निराशा भी इसी विरोध से मिली है.अब एक दांव भारत के हाथ में भी है.भारत अब एमटीसीआर का सदस्य देश है.चीन ने अपनी सदस्यता अर्जी 2004 में ही लगाई थी.चीन आज तक इसका सदस्य नहीं बन पाया.समूह देश में चीन के ऊपर सहमति नहीं बन पाई.अब सदस्य देशों में नया नाम भारत का है.यानी एनएसजी पर चीन की हां से ही एमटीसीआर पर भारत की हां का रास्ता खोलेगा.है न रोचक!
एनएसजी परमाणु आपर्तिकर्ता देशों का एक समूह है.इसके सदस्य देश आपस में व्यापार साझा करते हैं.टेक्नोलॉजी सहित यूरेनियम मिलने में सदस्य देशों को आसानी होती है.इन्हीं चीजों के मद्देनजर भारत ने सदस्यता की मांग की थी.लेकिन भारत कामयाब नहीं रहा.
चीन ने भारत का विरोध किया.दलील दी,भारत ने एनपीए यानी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है.बिना इसके परमाणु संसाधन का दुरूपयोग हो सकता है.चीन की ये शर्त बेबुनियाद मालूम पड़ती है.एनएसजी ग्रुप के कई देशों ने एनपीए साइन नहीं किया है.फिर भारत के मामले में ये नया पेंतरा क्यों?
बड़ा दिलचस्प है.चीन ने पाकिस्तान को एनएसजी सदस्य बनाये जाने की मांग की है.चीन ने कहा कि अगर भारत सदस्य बनता है,तो फिर पाकिस्तान भी बनना चाहिये.इसे चीन की मूर्खता कहें या पाक के प्रति दीवानापन.पाकिस्तान कागज पर लोकतांत्रिक देश है.हर दिन,हर क्षण वहां लोकतंत्र की हत्या होती है.यह सिर्फ हम नहीं सारा संसार कहता है.हां.चीन इससे असहमत हो सकता है.
विरोध एक नैसर्गिक प्रक्रिया है,होनी चाहिये.पर उसका एक मजबूत आघार होना जरूरी है.बिना तर्क का विरोध ईर्ष्या या द्वेष ही मालूम पड़ता है.चीन का विरोध कुछ ऐसा ही लगता है.भारत एक जिम्मेदार राष्ट्र है.विश्व में भारत की छवि एक शांतिप्रिय देश की है.चीन ने न सिर्फ इसे नजरदांज किया है,बल्कि अन्य देशों के भारत पर विश्वास को झूठलाया है.
भारत एनएसजी देशों को मिलने वाली सुविधायें नो साल पहले से उठा रहा है.2008 में अमेरिका के साथ हुए संधि के साथ ही भारत को परमाणु सुविधायें मिलने लगी थी..चीन ने इसे भी नहीं देखा.भारत की ये मांग विश्व मंच पर सिर्फ अपनी उपस्थिति से थी.
एनएसजी पर कूटनीतिक असफलता ने देश में विपक्ष को एक मुद्दा दे दिया है.विपक्ष ने इसे विश्व मंच पर भारत की पराजय बताया है.कुछ नेताओं का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन किया है.हालांकि वाद-विवाद लोकतंत्र की खूबसूरति है.कूटनीति कि सफलता-असफलता कभी हार-जीत का विषय नहीं होता.ये आमजन को ध्यान रखना होगा.
भारतीयों के लिए एक खुशी का कारण है.भारत एमटीसीआर यानी मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का का सदस्य बन गया है.भारत अब छोटे मिसाइल व टेक्नोल़ॉजी सदस्य देश को बेच सकेगा.भारतीय रक्षा क्षेत्र के व्यापार में यह बड़ी भूमिका अदा करेगा.बड़ी बात ये है कि भारत को ये कामयाबी पहली बार में ही मिली है.
एमटीसीआर में भारत की सदस्यता ने एक रोचकता को जन्म दिया है.चीन ने एनएसजी पर भारत का विरोध किया है.भारत को निराशा भी इसी विरोध से मिली है.अब एक दांव भारत के हाथ में भी है.भारत अब एमटीसीआर का सदस्य देश है.चीन ने अपनी सदस्यता अर्जी 2004 में ही लगाई थी.चीन आज तक इसका सदस्य नहीं बन पाया.समूह देश में चीन के ऊपर सहमति नहीं बन पाई.अब सदस्य देशों में नया नाम भारत का है.यानी एनएसजी पर चीन की हां से ही एमटीसीआर पर भारत की हां का रास्ता खोलेगा.है न रोचक!

इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है के क्या आज के परिवेश में भारत क लिए एन एस जी की सदस्यता उतनी अहम् है जितना के हम इसके लिए उतावले हैं...!!!
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