Saturday, 23 July 2016

उत्तर प्रदेश में चढा सियासी पारा

देश के सबसे बड़े प्रदेश में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है.उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधान सभा चुनाव होना है.प्रदेश की राजनीति का राष्ट्रीय महत्व है.अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इसे सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा है.यूपी की बड़ी आबादी को देखते हुए यह चुनाव मोदी मैजिक के लिए भी लिटमस टेस्ट साबित होगा.
अधिकतर राज्यों में क्षेत्रीय दलों की पकड़ मजबूत होती है.यूपी की राजनीतिक स्थिति इससे थोड़ी अलग है.क्षेत्रीय दलों के अलावा यहां भाजपा व कांग्रेस पार्टी की भी राज्य में अच्छी-खासी पहुंच है.राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार है.अखिलेश यादव के युवा चेहरे को पिछले विधानसभा चुनाव में वहां की जनता ने सर आंखों पर रखा.
सपा,बसपा,भाजपा,कांग्रेस,आरएलडी आदि तमाम दलों ने राज्य की राजनीतिक बिसात पर खेलना शुरू कर दिया है.जातीय समीकरण बनने लगे हैं.दलित वोटरों को अपने पाले में करना सभी दलों की पहली पसंद है.हालांकि इस बार अगरी जाति को भी लुभाने की कोशिश की जा रही है.
भारतीय जनता पार्टी खुद को पार्टी विद डिफरेंस कहती है.पार्टी के सबसे मुखर नेता व देश के प्रधानमंत्री मोदी जी हर जगह विकास की बात करते हैं.70 साल से पीड़ित जनता जब विकास की बातें सुनती हैं,तो उनके सपने आकार लेने लगते हैं.उनकी सोच में एक नए भारत का चित्र प्रतिबिंबित होता है.हाल में प्रधानमंत्री जी के गोरखपुर दौरे पर भी विकास की बातें हावी रहीं.पर यूपी में भाजपा ने सबसे पहले जातिगत कार्ड खेला.बसपा के बागी केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित वोटों को अपने पाले में करने की कोशिश की.
बसपा पार्टी की आंतरिक कलह से जूझ रही है.पार्टी से दिग्गज नेताओं का जाना बदस्तूर जारी है.बीएसपी के धाकड़ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ते वक्त पार्टी प्रमुख मायावती पर कई संगीन आरोप लगाए.मौर्य ने मायावती को दलित का कहकर संबोधित किया.पार्टी की इस खींचतान से निश्चित ही जनता में गलत संदेश गया है.
हाल में भाजपा के यूपी प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह के अमर्यादित बोल ने एक नया सियासी घमासान खड़ा कर दिया.बयान पर चोतरफा विरोध के बाद भाजपा ने तुरंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया.समाजवादी पार्टी फिर से अखिलेश यादव को आगे रखकर चुनावी समर में कूदेगी.राज्य में सपा की सरकार है.मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने पांच वर्षो के काम को चुनाव में जनता के सामने रखेगी.सपा में भी धरा है,एक बुजुर्गों का व एक मुख्यमंत्री के समूह में युवाओं का.
कांग्रेस के लिए यूपी एक बड़ा मौका है खुद को फिर से स्थापित करने का.पार्टी यूपी चुनाव के महत्व को बखूबी समझ रही है.राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर पार्टी की चुनावी रणनीति बना रहे हैं.मोदी की ऐतिहासिक जीत हो या बिहार में भाजपा के विजय अभियान को लगा महागठबंधन रूपी ब्रेकेज,प्रशांत किशोर की रणनीति के अंदर ही ये सब हुआ.
बहरहाल,अभी चुनाव में एक वर्ष का समय शेष है.जनता को लुभाने को कुछ घोषनाएं राज्य सरकार कर सकती हैं,केन्द्र की भाजपा सरकार भी इसमें खुद को पीछे रखना नहीं चाहेगी,जिसका आगाज गोरखपुर से मोदी कर चुके हैं.आज की जनता बेहद समझदार है.वो चुनावी वर्ष में राजनीतिक दलों के हर खेल को समझती है.राजनीतिक दल चाहें जितना भी समीकरण बना लें या जातीय कार्ड खेल लें,जनता का परिणाम तो पांच वर्षो के काम पर ही आएगा.

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