बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में पूर्ण शराब बंदी की घोषणा की है.सरकार का ये फैसला 1 अप्रेल 2016 से लागू होगा.नीतीश सरकार के इस फैसले से राज्य को 4 हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान होगा.लेकिन नीतीश कुमार ने शराब से अर्जित राजस्व के ऊपर लोगों की खुशहाली को प्रथमिकता दिया है जो कि स्वागत योग्य है.इस नियम के लागू होते ही बिहार उन राज्यों की कतार में आ जयेगा जहां शराब प्रतिबंधित है.देश के तीन राज्यों-गुजरात,नागालेंड व मणिपुर में पहले से ही शराब पूर्ण प्रतिबंधित है.अब इस सूची में अगला नाम बिहार का है.सरकार का यह निर्णय सुशांत समाज निर्माण की दिशा में निहायत ही बहुत बड़ा क़दम है.लेकिन इस क़दम की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जबकि इसे सख्ती से पूरे राज्य में लागू किया जायेगा.आज राज्य या राष्ट्र में प्रतिबंधित चीजों की एक लम्बी फेहरिस्त है,लेकिन ये सारी चीजें बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं.तम्बाकू पे प्रतिबंध हो या पब्लिक प्लेस पे स्मोकिंग की मनाही कागज पे तो ये सारी चीजें प्रतिबंधित हैं लेकिन वास्तविकता हर छोटे पान की दुकान पर दिखते तम्बाकू उत्पाद के गुच्छे और सार्वजनिक जगहों पर स्मोकिंग करते लोगों को देखकर बखूबी लगाया जा सकता है.शराब को राज्य में पूर्ण प्रतिबंधित करना सरकार के लिये आसान नहीं होगा.गुजरात,नागालैंड और मणिपुर जहां शराब पहले से प्रतिबंधित है रिपोर्ट कहते हैं कि इन राज्यों में भी लिकर अन्य राज्यों की तरह आसानी से उपलब्ध हैं.गुजरात की सच्चाई तो यहां तक है कि वहां लिकर की होम डिलेवरी भी होती है.प्रत्येक साल गुजरात में 100 करोड़ का अवैध शराब जब्त किया जाता है.इन सारी चीजों की उपस्थिति के बाद राज्य में पूर्ण शराब बंदी लागू करना नीतीश कुमार के लिये एक चुनौती होगा.सरकार अगर समाज कल्याण के लिये शराब बंदी को लागू करना चाहती है तो इसमें प्रशासन व आम लोगों की भूमिका अहम है.जब तक समाज के इन दो लोगों का साथ नहीं होगा कोई भी नियम या कानून ग्राउंड जीरो पर अमल में आ नहीं सकती.कई बार इस तरह की कानून के नतीजे उलट होते हैं और ये पुलिस-प्रशासन की भ्रष्टचार का नया जरिया बन जाता है.सरकार के लिये ये एक बड़ा चैलेंज होगा और अगर सरकार इसे रोकने में कामयाब होती है तो इस निर्णय की अप्रत्याशित सफलता मिल सकती हैं.
Thursday, 26 November 2015
Saturday, 7 November 2015
महिलाओं के बिना समाज का विकास अधूरा
महिलायें समाज का आधार होती हैं.महिलाओं को जगत जननी का दर्जा प्राप्त हैं.एक समृद्ध राष्ट्र कि कल्पना तभी की जा सकती है जब वहां की महिलायें शिक्षित हों.खुशहाल समाज का निर्माण शिक्षित महिलाओं की उपस्थिति से ही होता है.इसमें कोई दो राय नहीं की समाज के विकास के लिये महिलाओं का विकास ज़रूरी है.पर अफसोस!आज भी हमारे देश में महिला शिक्षा दर 100 फीसदी नहीं है.महिलाओं की निरक्षरता उसकी आवाज़ को बुलंद न होने देने का सबसे बड़ा कारण है.समाज की दो धूरी में एक महिलाओं का शिक्षित होना किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिये सर्वदा ज़रूरी है.महिला सशक्तिकरण,सुदृढीकरण ये सब नारे तभी सफल होंगे जब महिलाएँ जागरूक होंगी.और यह जगजाहिर है कि जागरूकता बिना शिक्षा के सम्भव नहीं !आज हर तरफ़ महिलाओं पर हों रहें अत्याचार,जुर्म व भेद-भाव की खबरें सामने आ रही हैं.पुरुषवादी इस समाज में महिलाओं की स्थिति कुछ-कुछ उस बंधुआ मजदूर की तरह हो गयी है जिसे जब चाहा जैसे चाहा अपने स्वार्थ खातिर उपयोग कर लिया.
आज समाज की दो धूरी स्त्री और पुरुष के बीच की खाई विशाल हो गयी है.अगर कुछ उदाहरण को छोड़ दिया जाये तो समाज में महिलाओं के विचार गौण हैं.उनकी महत्ता नगण्य हैं.समाज में उनका योगदान पुरुषों की तुलना में बहुत काम है.ऐसा क्यों ?
जब समाज की उत्पत्ति में दोनों का बराबर योगदान है तो इसके निर्माण में क्यों नहीं !किसी भी राष्ट्र के सम्यक विकास की नीति में महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता और महिलाएँ तभी पुरुष से कदमताल कर समाज में अपना योगदान दें सकेंगी जब वह शिक्षित हों.ऐसी अवधारणा है की बच्चे का प्रथम गुरु उसकी माँ होती हैं,लेकिन जब समाज का प्रथम गुरु ही निरक्षर होगा तो शिक्षित,खुशहाल और समृद्ध राष्ट्र की कल्पना करना कितना जायज होगा!!!
नयन
Monday, 5 October 2015
Parties will must bring change their perception
The election campaigning in Bihar has been started.Bihar legislative assembly election is important countrywide because of Bihar is a third most populous state of India,means Bihar gives the country wide political idea that is why these days the sight of all the political analysist has come to the Bihar.
Mostly parties has declared their manifesto or vision to developed the Bihar.The declaration of manifesto has been very mysterious game.All party wants to declare catchy manifesto which grasp the public attention.All political parties has owned this principle to divert the public.divertion from the basic fulfillment of life,poverty,unemployment,illiteracy, corruption,feudalism,nepotism and there are so many things which offer obstruction while growing a general people.
Parties do not stay here for catching public attention.They has even announced that kind of temptatious thing that is not possible to fulfillment for that particular economy.parties will must understand that this type of baseless politics will not run too much days.And it's a good time when political parties can bring change in their political perception about the public.parties have to understand that public is been everything in democracy.they decide who is best for us or not!
Thanku!your thinker:Nayan
Friday, 2 October 2015
जनता के अरमानों को समझें दल
एक पुरानी कहावत है,लिखित शब्दों की जगह मौखिक शब्दों का महत्व गौण होता है,लेकिन राजनीति में ठीक इसके विपरीत होता है.जिस राजनेता में बड़बोलापन जितनी अधिक होगी वे उतने ही राजनीतिक कुशल हैं.हमारे नेताओं को आंकड़ों की राजनीति अच्छी नहीं लगती,वे इससे कतराते हैं क्योंकि उनके कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है.
बिहार में चुनावी राजनीती का अभिनय शुरू हो गया है.तमाम दल जनता को अपने पाले में करने के लिये बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं.खुद को जनता का सबसे वफादार साबित करने की होड़ लगी है.कोई भी दल इस समर में खुद को पीछे नहीं देखना चाहता।राजनीति के ये शूरमा जनता को अपनी पार्टी के प्रति आसक्त करने के लिये राजनीति के बिसात पर तमाम चाल को आजमा लेना चाहते हैं.बाद में कोई कशक न रह जाये इसके लिये हर तरह के ट्रम्प को आजमा लिया जा रहा है.लेकिन सवाल यह है कि राजनीतिक डालो को जनता की याद चुनाव के दरम्यान ही क्यों अति है!आखिर सरकार बनने के बाद वह 5 साल तक ऐसे कौन से शोध में लगे रहते हैं जिसका सिर्फ शोध पत्र अगले चुनाव प्रचार में सामने आता है,और फिर इसे भविष्य की विकास नीति बता चुनाव लड़ी जाती है.अगर ऐसा नहीं है तो हर चुनाव केवल बिजली,पानी,गरीबी,बेरोजगारी व अशिक्षा के नारों पर ही क्यों लड़ा जाता है.सरकार समाज के विकास की दूरदर्शी नीति बनाये इससे किसी को कोई परेसानी नहीं,लेकिन ये नीतियां समाज के कल्याण के लिये होनी चाहिये नाकि फाईलों की सुंदरता के लिये।अगर राजनीतिक दल सही रूप में कार्य करना चाहते हैं,तो वह अपनी नीतियों के लिये समय-सीमा तय करें।यदि किसी विशेष कारण के बिना वह तय समयावधि के भीतर कार्य करने में असफल होते हैं तो जनता से माफ़ी मांगे।राजनीतिक दलों के सर जनता के कल्याण का शेहरा बंधा है उसे अटल रखना नेताओं की जिम्मेवारी है.जनता पारदर्शी नेतृत्व चाहती है.जनता कांच की तरह बेदाग शासन चाहती है.दलों के पास जनता के अरमानों की बलि देने का कोई अधिकार नहीं है.अगर दल सही मायने में तरक्की पसंद हैं तो उसे उदार बनना होगा,उन्हें सच्चाई स्वीकार करने की आदत डालनी होगी।यदि किसी दूसरे दल की नीतियों में कुछ अच्छा है तो उसे बेझिझक स्वीकार करना होगा।जनता उदार नेतृत्व चाहती है.जनता एक ऐसा नेतृत्व चाहती है जिसमे अच्छी चीज़ो का सब मिलकर सम्मान करें और गलत चीज़ों के खात्मा का संकल्प लें.
समाज को बदलना किसी दूसरे गृह की बात नहीं है.यदि इच्छाशक्ति ढृढ़ तथा विजन स्पष्ट हो तो देखते ही देखते समाज बदल जाएगी।और फिर झूठ,फरेब व दोषारोपण की राजनीति नहीं करनी पड़ेगी
धन्यवाद!आपका विचारक:नयन
Friday, 18 September 2015
हमें अपनी शक्ति पहचाननी होगी
भारत कालांतर में शिक्षा का विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र रहा है.यहां अनेकों ज्ञानी पुरुष हुए जिन्होंने विश्व समाज को अँधेरे से प्रकाश की ओर चलने का मार्ग बताया.महात्मा बुद्ध,गुरुनानक,ऋशभदेव,तुलसीदास,कालीदास,गुरु गोविंद सिंह,वाल्मीकि,पाणिनि,रामकृष्ण परमहंस व विवेकानंद जैसे देव तुल्य आत्माओ ने विश्व को शांति,आध्यात्म,समरसता तथा जीवन की परिभाषा से सम्पूर्ण जगत को अवगत कराया.इन अलौकिक मानवों की वजह से भारत ने सारे जगत में ज्ञान भूमि का दर्जा पाया.हमारा सिक्का सोलहों दिशाओं में बजता था.हमारी कही गई हर एक बात ब्रह्म लकीर होती थीं.हम सम्पूर्ण विश्व को शिक्षित करते थे.यहां दुनिया के लगभग हर कोने से लोग दीक्षा हासिल करने आते थे.लेकिन कहते हैं,समय बलवान होता है.आखिर ऐसा किया हुआ कि हम वाचक से याचक बन गए.सवाल बड़ा मार्मिक है कि वक्त ने ऐसी कौन सी करवट ली की हम अपनी पहचान ही भूल गए.और यह भूल ऐसी की हमने इसे वर्षों तक याद ही नहीं किया.परिणाम सामने है,आज विश्व में भारत की गिनती एक औसत दर्जे के देश में होती है,जहां आज भी शिक्षा की पहुंच 100 फीसदी लोगों तक नहीं है.जिसने विश्व को शिक्षित किया वह खुद आज अशिक्षित है,सदैव प्रकाशवाण रहने वाली यह भूमि आज अंधकार में है.दुनिया को रौशनी दिखाने वाली यह धरती आज खुद रौशनी की तलाश में है.इन सब परिस्थितियों के उत्पन होने के पीछे कारण जो भी हो इसका पता लगा हमें उस दिशा में बढ़ने की ज़रूरत है.यदि हम एक बार पुनः सही रास्ते का खोज कर उस पर चलते हैं तो कोई कारण नहीं जो हमें अपनी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से रोक ले.हम एक बार फ़िर विश्व सोच बन जायेंगे यह विश्वास हर एक जन को अपने अंदर पैदा करना होगा.अगर यह संकल्पना हम सभी लेते हैं तो भारत एक बार फ़िर उसी ऊर्जा के साथ उगेगा,निश्चित रुप से उगेगा क्योंकि किसी अँधेरे में इतनी ताकत नहीं जो आफ़ताब से उठने वाली किरणों को अपनी आगोश में छुपा लें.यह किरण चीर देगी हर उस अँधेरे को जिसने हमारी पहचान पर काली पट्टी लगा रखी है.हम फिर प्रदीप्त हो जायेंगे बशर्ते हमारा विश्वास निरंतर अडिग रहे.
धन्यवाद!आपका विचारक:नयन
Wednesday, 2 September 2015
समाज के दर्जी हैं शिक्षक
सितम्बर महीने के आते ही स्कूल,कॉलेज व अन्य शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों में विशेष तैयारियों का दौर शुरू हो जाता है.हो भी क्यों न हम प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के पवित्र पावन के रुप में जो मानते हैं.छात्र-छात्रओं के जीवन में शिक्षक का स्थान काफी ऊँचा है.समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी रुप में छात्र होता है,इसलिए शिक्षक दिवस के इस निर्मल पावन की महत्ता स्वयं ही बढ़ जाती है.भरतीय संस्कृति में गुरु का स्थान देव से भी ऊँचा रखा गया है,इस बात का वर्णन कई धर्म ग्रंथों में मिलता है,गुरुड़ ब्रह्म,गुरूड़ विष्णु...या गुरू गोविंद दौऊ खड़े...आदि पंक्तियों में गुरू की महिमा का वर्णन बखूबी मिलता है.
भारत एक दिव्य अनुशासित राष्ट्र है.यहां हर अच्छी चीजों को समाज में आला दर्जा दिया जाता है.यहां के कण-कण में आदर का भाव वशीभूत है.यह राष्ट्र व्यक्ति मात्र के लिये कृतज्ञता जाहिर करता है,ये हमारे देश का संस्कार है.शिक्षक दिवस भी इसी का एक नमूना है.भारत के पूर्व राष्ट्रपति,महान शिक्षाविद व उससे भी बड़े दार्शनिक डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति कृतज्ञता अर्पित करने के लिये राष्ट्र प्रति वर्ष उनके जन्म दिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रुप में मनाता है.शिक्षक दिवस का दिन डॉक्टर राधाकृष्णन के राष्ट्र के प्रति योगदान के साथ-साथ विश्व के उन तमाम गुरुओं को नमन करने का दिन है जिसने गुरु शब्द की सार्थकता को हर परिस्थिति में सिद्ध किया है.गुरु शब्द का संयोजन दो अक्षरों से मिलकर होता है-गु और रु.
गु मतलब अज्ञान रूपी अंधकार व रु मतलब ज्ञान रूपी प्रकाश अर्थात गुरु वह है-जो हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जायें.शिक्षक दिवस कई मायने में हमें बहुत कुछ सिखाता है,जिसमें समाज को बदलने का माद्दा है.अगर हम अपने जीवन के हर समय में सीखने की ललक रखने वाले एक छात्र व विनम्रता के स्मारक गुरु को जीवित रखें तो यह जीवंतता समाज सुधारक हो सकती है,दिव्य व समृद्ध समाज का निर्माणकर्ता हो सकती है.
एक बार पुनः विश्व के तमाम शिक्षकों को नत मस्तक नमन!गुरु का समाज के प्रति योगदान नि:शब्द है,इनके बहुमूल्य समाजिक योगदान का संसार कर्जदार है.
आपका विचारक:नयन
धन्यवाद!!!
Wednesday, 26 August 2015
राजनीति की मर्यादा को न गिराये दल
राजनीति का खेल भी निराला है,यहां सब जायज है.इसमें न तो दोस्ती पक्की होती है और न ही दुश्मनी स्थायी.भरतीय राजनीति के रंग ही कुछ ऐसे हैं,जिस पार्टी को चुनाव प्रचार में सबसे भ्रष्ट बताया उसी से चुनाव परिणाम बाद सत्ता खातिर गठजोड़ कर ली.सत्ता पाने की भूख हमारे राजनीतिक दलों में इतनी है कि ये लोग किसी भी दस्तरखान पर आसन लगाने में नहीं हिचकते.
लगभग जितने भी राजनीतिक दल हैं,उनका पहला और प्राथमिक उदेश्य होता है किसी भी तरह गद्दी हासिल की जाये.राजनीतिक दलों की सारी आदर्श बातें चुनाव प्रचार तक ही सीमित रहती हैं,इसके बाद ये लोग आम जनों के विश्वास को हलाल करने में भी गुरेज नहीं करते.इन लोगों के लिये मर्यादा व विचारधारा कोई मायने नहीं रखती.इतिहास इन चीजों का कई बार गवाह बना है.फिर बात 2013 के दिल्ली विधान सभा चुनाव की हो या पिछले साल हुये जम्मूकश्मीर विधानसभा के चुनाव का अथवा बिहार की राजनीति का महगठ्बन्धन इसमें राजनीतिक दलों ने जिस तरह से राजनीति की सारी विचारधारा को तार-तार करते हुये एक दूसरे से हाथ मिलाया इसके बाद इस सम्बन्ध में बहुत कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है....और वैसे भी ये उदाहरण तो सिर्फ एक बानगी हैं,ऐसे विश्वास परस्त राजनीति के बहुसंख्य उदाहरण हैं.राजनीतिक दलों की सत्ता पाने हेतु किसी भी हद से गुजरने वाली जज्बा ने जनता के विश्वास,अरमान व सपने की कई बार बलि दी है.
हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने हमें आज़ादी दिलायी राष्ट्र के नवनिर्माण के लिये,जहां प्रत्येक नागरिक का स्वाभिमान हो किसी भी रुप में किसी के अधिकार का अतिक्रमण न हों लेकिन,आज हमें अपनी आजादी पर ही शंका होती है.क्या हम वास्तविक रुप में आजाद हैं?
क्या हम सभी स्वभिमान सहित जिंदगी जीतें हैं?या फिर यह आजादी हमें सिर्फ सत्ता के बदलाव के रूप में मिली है.पहले अंगरेज़ हम पर छलनीति से राज़ करते थे और आज़ वही काम हमारे राजनीतिक दल कर रहें हैं.अगर राजनीतिक दल लोकतंत्र की बुनियाद जनता के प्रति ही उत्तरदायी नहीं होंगे तो इसे क्या कहेंगे?राजनीति!या छलनीति
धन्यवाद!
आपका विचारक:नयन
Saturday, 22 August 2015
चुनावी जुमला या नयी राजनीति की शुरुवात......
मोदी सरकार ने बिहार को 1.65 लाख करोड़ का विशेष आर्थिक पेकेज देकर राजनीति के बिसात पर बहुत बड़ा दांव खेला है.बिहार विधानसभा का चुनाव आगामी अक्टुबर -नवम्बर महीने में होने वाले हैं,जिसे देखते हुये इस विशेष आर्थिक पेकेज को राजनीतिक महकमे में सियासी चाल की संज्ञा दी जा रही है.तमाम विपक्षी पार्टी इसे बिहार की जनता को लुभाने का हथकण्डा बता रही.विपक्ष का कहना है कि चुनाव आते ही प्रधानमंत्री किसी खास जगह पर केंद्रीत हो जाते हैं जो कि प्रधानमंत्री की पद की गरिमा के खिलाफ है.महगठ्बन्धन के नेताओं का कहना है कि बीते 15 महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की एक भी यात्रा नहीं की लेकिन,चुनाव आते ही मोदी ने बिहार में डेरा डालना शुरू कर दिया.यह तुष्टीकरण की राजनीति को प्रदर्शित करता है.विपक्ष के आरोपों पर गौर करें तो यह एक हद तक जायज भी है.सत्तासीन होने के बाद मोदी ने एक बार भी बिहार का दौरा नहीं किया और न ही उन्होने बिहार की भविष्य योजनाओं के ऊपर कोई उच्च स्तरीय चर्चा की जबकि पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात कह चूके हैं.ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है.हालाँकि.प्रधानमंत्री का हर सभा में हर जगह विकाश योजनाओं पर चर्चा करना निहायत ही सुंदर राजनीति के लिये अच्छा संकेत है.कम से कम बात विकाश की हो तो रही......
चुनाव प्रचार को जाति,धर्म व मज़हब से अलग तो किया जा रहा......यह नयी राजनीति के लिये शुभ है.
लेकिन,अगर मोदी सरकार की यह घोषणा चुनाव परिणाम पर निर्भर करती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा !
अगर प्रधानमंत्री ने सही मायने में विकसित बिहार की कल्पना की है तो चुनाव परिणाम कुछ भी हों,बिहार की गद्दी पर शासन चाहे जिस भी दल का हो,पेकेज की राशि बिहार सरकार को समय दर समय मिलें.यह नयी राजनीति की परिभाषा होगी पर पहले की कुछ घोषणाओं की तरह अगर यह भी महज चुनावी जुमला साबित हुआ तो यह भरतीय जनता पार्टी के पतन के कारणों में से एक हो सकता है.
आपका विचारक:नयन
धन्यवाद !!!
Wednesday, 19 August 2015
देश के प्रति ईमानदार रहें हम
स्वतंत्रा दिवस की 69 वी सालगिरह पर सभी देशवासियो को ढेर सारी शुभकामनायें.आज क दिन सभी देशवासियों के लिये बेहद खास है.आज के दिन ही हम गुलामी की जंजीर से आजाद हुये,और अपने देश पर अपने लोगों का राजनीति उन्मुख हुआ.आज का दिन उन वीर सपूतों के सोच,विचार,समर्पण और शहादत को यद करने का दिन है,जिसके फलस्वरूप आज हम आजाद हैं.हमारे स्वतंत्रता सैनानियो ने अखंड,सम्प्रभुत्व,शिक्षित और अतुलनीय भारत की परिकल्पना के लिये आजादी की लड़ाई लरी.उन राष्ट्र प्रणेताओ की सोच अद्वितीय भारत बनाने की थी जिसके लिये उनलोगों ने सबसे पहले देश को क्रूर शासन से अलग किया.
हम आजाद हुये.राष्ट्र पर अपने लोगों का रज हुआ.भारत प्रगति कि लकीर खुद के हाथों से गढ़ने लगा.लेकिन,गुजरते समय के साथ लोगों मे राष्ट्र भक्ति की भावना कमजोर पड़ने लगी और आज राष्ट्र उस मुहाने पर खड़ा है,जहां देश भक्ति की भावना लगभग मलिन पर गयी है.भ्रष्टाचार से हमारा देश पूर्व समय से ही ग्रसित है.सामंतवाद की नीति दिन व दिन बढ़ती जा रही है.साम्प्रदायिकता की हवा आज भी चलती है.अगर इन मुद्दों पर गौर करे तो हम पाते हैं की इनके पीछे एक बड़ा कारण-लोगों में देश भक्ति की भावना का कमना है.देश के सभी लोग अगर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझ ले तो भ्रष्टाचार,सामंतवाद और सम्प्रदायिकता की कुरीति स्वतः ख़त्म हो जायेगी.ज़रूरत है,लोगों को शिक्षित,जागरूक और राष्ट्र के प्रति अपनी कर्तव्यों का बोध कराने की.अगर वर्तमान समय में इस और ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य-स्वार्थी,मौकापरस्ती व छोटे बड़े की खाई को बढ़ाने वाला होगा.
स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेताओं को याद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि-हम अपने अंदर राष्ट्र भक्ति की भावना को सदैव जीवंत रखें.
आपका विचारक: नयन
जय हिंद! जय भारत!
हम स्वार्थी तो नहीं हो रहें.......
स्वतंत्रा दिवस की 69 वी सालगिरह पर सभी देशवासियो को ढेर सारी शुभकामनायें.आज क दिन सभी देशवासियों के लिये बेहद खास है.आज के दिन ही हम गुलामी की जंजीर से आजाद हुये,और अपने देश पर अपने लोगों का राजनीति उन्मुख हुआ.आज का दिन उन वीर सपूतों के सोच,विचार,समर्पण और शहादत को यद करने का दिन है,जिसके फलस्वरूप आज हम आजाद हैं.हमारे स्वतंत्रता सैनानियो ने अखंड,सम्प्रभुत्व,शिक्षित और अतुलनीय भारत की परिकल्पना के लिये आजादी की लड़ाई लरी.उन राष्ट्र प्रणेताओ की सोच अद्वितीय भारत बनाने की थी जिसके लिये उनलोगों ने सबसे पहले देश को क्रूर शासन से अलग किया.
हम आजाद हुये.राष्ट्र पर अपने लोगों का रज हुआ.भारत प्रगति कि लकीर खुद के हाथों से गढ़ने लगा.लेकिन,गुजरते समय के साथ लोगों मे राष्ट्र भक्ति की भावना कमजोर पड़ने लगी और आज राष्ट्र उस मुहाने पर खड़ा है,जहां देश भक्ति की भावना लगभग मलिन पर गयी है.भ्रष्टाचार से हमारा देश पूर्व समय से ही ग्रसित है.सामंतवाद की नीति दिन व दिन बढ़ती जा रही है.साम्प्रदायिकता की हवा आज भी चलती है.अगर इन मुद्दों पर गौर करे तो हम पाते हैं की इनके पीछे एक बड़ा कारण-लोगों में देश भक्ति की भावना का कमना है.देश के सभी लोग अगर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझ ले तो भ्रष्टाचार,सामंतवाद और सम्प्रदायिकता की कुरीति स्वतः ख़त्म हो जायेगी.ज़रूरत है,लोगों को शिक्षित,जागरूक और राष्ट्र के प्रति अपनी कर्तव्यों का बोध कराने की.अगर वर्तमान समय में इस और ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य-स्वार्थी,मौकापरस्ती व छोटे बड़े की खाई को बढ़ाने वाला होगा.
स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेताओं को याद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि-हम अपने अंदर राष्ट्र भक्ति की भावना को सदैव जीवंत रखें.
आपका विचारक: नयन
जय हिंद! जय भारत!
Tuesday, 7 July 2015
Ese vibration he kahenge na.....
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