आमतौर पर जनता को अपने सांसदों से शिकायत रहती है कि वे लोग जनहित के पैसों का सही इस्तेमाल नहीं करते हैं.अगर आप भी इस तरह की राय रखते हैं,तो आप गलत भी हो सकते हैं.वैसे भी सभी को एक ही कोटि में नहीं रखा जाता है.बैजयंत जय पांडा.याद कर लीजिये इस नाम को.आदरणीय बीजू जनता दल(बीजद) से ओडिशा से सांसद हैं.आप कहेंगे,इन्होंने क्या कीर्तिमान स्थापित कर दिया कि हम इनका नाम याद रखें.सांसद ही तो हैं.देश में सैकड़ों हैं.तो सुन लीजिये.
सांसद महोदय देश की संसद की शीतकालीन सत्र के नहीं चल पाने से निराश हैं.जन कल्याण व नीति निर्माण के बदले संसद में हुई हंगामेबाजी का इन्हें अफ़सोस है.सरकारी खजाने के पैसे को ये जनता की अमानत मानते हैं.इनका कहना है कि इस पैसे का अधिक से अधिक खर्च लोक कल्याण में होनी चाहिये.संसद सत्र के नहीं चल पाने से इन्होंने खुद को मिलने वाली वेतन व भत्ते के एक अंश को लौटा दिया है.इन्होंने कहा कि हम सांसदों को वेतन व भत्ते जनता की कामों को करने के लिये मिलते हैं.हम अगर यह काम नहीं करते हैं,तो हमें उस पैसे को पाने का अधिकार नहीं है.आपको बता दें कि विगत चार-पांच वर्षों में जब भी सत्र नहीं चला है या बाधित रहा है,तो सांसद जी वेतन-भत्ते के कुछ भाग को सरकारी खजाने में जमा कर देते हैं.
संसद सत्र के चलने में एक बड़ी राशि खर्च होती है.सांसद बैजयंत जय पांडा को वेतन-भत्ते के रूप में मिलने वाली राशि इसका एक अंश भी नहीं है.पर इनकी कोशिश अंधेरे में चिराग जलाने जैसी है.जनता के पैसों पर ऐश की जिंदगी जीने वालों को आईना दिखाने सी है.यह जनता के पैसों का सम्मान है.यह हमारी राजनीति जिसकी भ्रष्टता की कहानी हम ज्यादा सुनते हैं,में एक उदाहरण है.आशा है.बैजयंत जी के प्रयासों का हमारे सभी माननीय अनुकरण करेंगे.सरकारी खजाने के पैसों को खुद की जागीर नहीं,जनता की समझेंगे.















